आधुनिक शहर की चुनौतियां और शहरीकरण की नयी अवधारणा

आजकल दिल्ली की जनता धुंध और धुंएं की दहशत से बेहाल और परेशान है । सुप्रीमकोर्ट, हाई कोर्ट, हरित न्यायाधिकरण रोज-रोज सरकारों को तरह-तरह के निर्देश दे रहे हैं और सरकारें फौरी तौर पर खुद को बचने-बचाने के लिए ताबडतोड़ घोषणाएं कर रही हैं । विगत तीन दशकों से साल-दर-साल ऐसे दिन आते हैं और सारे किरदार अपनी इसी भूमिका को पूरा करने के बाद अगला साल आने तक इसे ठंडे बस्ते में डाल देते हैं । मूल प्रश्न यह है कि हम किस हालत तक पहुंच गए हैं ! हम विकास की जिस दिशा में बढ़ रहे हैं क्या उससे समाधान का रास्ता निकलेगा या हम इसी अंधी गली में फंसते ही चले जाने वाले हैं । हमने विकास के माॅडल को पश्चिम के विकसित कहे जाने वाले मुल्कों से लिया है और वे सब मुल्क “आज की हमारी हालत“ से निकलने की कोशिश करते-करते अभी भी फंसते ही जा रहे हैं और हम हैं कि उन्हीं के पद-चिन्हों पर चलते हुए निदान खोजने में लगे हैं । अभी तक इस रास्ते पर चलते हुए कोई धुंध-धुंएं की दहशत से बाहर निकल पाया है, इसका उदाहरण नहीं मिलता है ।

दरअसल, आज हमारे शहरों की हालत, 1952 के लन्दन के हालत की तरह है । तब सारा लंदन धुंएं और धुंध की गिरफ्त में आ गया था जिसे “ग्रेट स्माॅग आॅफ लन्दन“ के नाम से पुकारा गया । इस वजह से हजारों लोगों की जिंदगी चली गई और बड़ी संख्या में लोग लंबी बीमारी के शिकार हुए । वहां की तत्कालीन सरकार ने इसके बचाव में एक कानून बनाया जिसे “क्लीन एयर एक्ट“ के नाम से जाना गया । परंतु धीरे-धीरे कारों और दूसरे मोटरवाहनों की बढ़ती संख्या वहां फिर वही हालत पैदा करने लगी । उससे बचने के लिए सरकार ने बड़े-बड़े फ्लाईओवर तथा बहुमंजिली कार पार्किंग के माध्यम से ढंकने के उपाय किए गए । लेकिन यह भी तत्कालीन आघात पर “परत“ डालने जैसा ही था और आज भी विकसित मुल्कों के शहर इस तरह दुश्वारियां झेलने को अभिशप्त हैं । जब पश्चिम के देशों ने आधुनिक विकास के रास्ते पर चलते हुए शहरों को गढ़ना शुरू किया तो उन्होंने शहरों की परिकल्पना से कृषि, पशुपालन और उससे जुड़ी हुई गतिविधियों को निकाला ही नहीं, बल्कि उस पर बंदिशें भी लगा दीं । इस वजह से पर्यावरण संतुलन की प्रक्रिया तहस-नहस हो गई और आज हम प्रकृति की विनाश-लीला झेलने को अभिशप्त हैं । इसकी जद में हमारा शहरी समाज ही नहीं, ग्रामीण समाज भी आ चुका है ।

हम भी पश्चिम की बयार में बह गए । हमने भी अपने शहरों के निर्माण में कृषि, पशुपालन, उद्योग और उससे जुड़े जीविकोपार्जन के सभी साधनों को समाप्त कर नया मास्टर प्लान बनाया जिसने हमारे समाज की गतिविधियों को खण्ड-खण्ड में बांट दिया और हमारा तानाबाना पूरी तरह से खत्म हो गया । हमने शहरी मास्टर प्लान के तहत मनुष्य, पशु-पक्षी और प्रकृति के रिश्ते को समाप्त कर दिया । इससे भोजन और मल-उत्सर्जन के साथ प्राकृतिक रिश्ते समाप्त हो गए । इस कारण थल और जल प्रदूषण और गंदगी के भंडार में परिवर्तित होते गए । यह सरकार के सफाई और स्वच्छता अभियानों से भी नहीं संभल पा रहा है, जबकि समाज के अरबों रुपये इस मद में खर्च हो रहे हैं । हम अपनी जरूरतें प्रकृति के दूसरे प्राणियों से पूरा करते हैं और दूसरे प्राणी अपनी आवश्यकताएं हमसे पूरा करते हैं । उदाहरण के लिए, हम प्रकृति और दूसरे प्राणियों से भोजन प्राप्त करते हैं और हमारा कचरा दूसरे प्राणियों के लिए भोजन है । इस कारण इस धरा पर कचरा के भंडारण की न कोई व्यवस्था थी और न जरूरत । लेकिन हमने इस विचार को खण्ड-खण्ड कर दिया और अपने आस-पास गंदगी और बदहाली का पहाड़ खड़ा कर दिया और आज हम सब इसके शिकार हैं ।
आज इस स्थिति से निपटने के लिए विकसित दुनिया के शहर वापस लौटने की कोशिश में हैं और खेती-किसानी का बदला हुआ स्वरूप आजमाया जाने लगा है ।

दुनिया के खूबसूरत शहरों में शुमार है पेरिस । वह भी आज कृषि के नए प्रयोग के लिए अग्रसर है । पेरिस के दक्षिण-पश्चिम हिस्से में चैदह हजार वर्ग मीटर में फैली छह मंजिली इमारत की ऊपरी छत (रूफ टाॅप) पर अर्बन फार्मिंग का निर्माण किया गया है । कहा जाता है कि यह अर्बन फार्मिंग दुनिया में अपनी तरह के सबसे बड़े फार्म पर होगी । इसकी देख-रेख तीस प्रशिक्षित माली करते हैं और यहां तीस तरह के पौधे लगाए जाएंगे तथा हाई सीजन में एक हजार किलो फल और सब्जियां मिलेंगी । इसके संस्थापक पास्कल हार्डी का कहना है, “हमारा विजन एक ऐसे शहर का है जहां हर खाली छत और खाली जगह पर फार्मिंग हो, और हर शहरवासी शहर को खिलाने में योगदान देगा, जबकि आज शहरी लोग सिर्फ खाने वालों का समूह हैं ।“ क्यूबा की राजधानी हवाना 1990 से अर्बन फार्मिंग की तरफ अग्रसर है और आज वह अर्बन फार्मिंग में अग्रणी शहर है । एक वक्त विकसित देशों ने अपने शहरों से कृषि और पशुपालन को अलविदा कहा था, आज उन्हीं शहरों में खेती धीरे-धीरे पैर पसारते हुए आंदोलन का रूप लेती जा रही है । एक जमाने में अमेरिका का डेटोरेट शहर आॅटोमोबाइल इंडस्ट्री का हब माना जाता था । यह 2012 में दिवालिया हो गया । शहर का कारोबार ठप हो गया । धीरे-धीरे शहर फिर से पुनर्निर्माण की ओर अग्रसर हुआ, पहले से बदले हुए स्वरूप में । शहर के नए मास्टर प्लान में शहरी कृषि और पशुपालन को समाहित किया गया और उसके अनुकूल ढांचागत सुविधा भी । न्यूयार्क शहर में सात सौ किस्म के कृषि-उत्पादन हो रहे हैं । यह खेती शहर में खाली पड़ी जमीनों, कंपनियों के खाली मैदानों, रेलवे लाइन के किनारे की भूमि और सड़क के दोनों किनारों की खाली जमीनों पर की जा रही है । लंदन में 13 हजार 5 सौ 66 हेक्टेयर में खेती हो रही है । इसमें 15 प्रतिशत जमीन शहर के अंदर है और बाकी अर्ध-शहरी इलाकों में है । रूस के पीटर्सबर्ग में शहरी खेती से बीस लाख लोगों की पारिवारिक आमदनी में मदद मिलती है । इसके अलावा नीदरलैंड, फिनलैंड, स्पेन आदि देशों में शहरी खेती और उससे जुड़ी गतिविधियों को प्रोत्साहन देने के लिए विशेष ध्यान दिया जा रहा है । लैटिन अमेरिका, आॅस्ट्रेलिया के साथ-साथ दक्षिण एशिया में शहरी कृषि के अलग-अलग स्वरूप तेजी से फैल रहे हैं ।

भारतीय शहर भी इससे अछूता नहीं हैं । सरकार द्वारा शहरी खेती पर तमाम कानूनी बंदिशों के बाद भी हमारे शहरों में खेती जारी है । हम लोग दिल्ली में कृषि और उससे जुड़ी हुई गतिविधियों को जानने-समझने की कोशिश कर रहे हैं । इसी अभियान के दौरान हम लोग इस साल अगस्त में यमुना नदी के किनारे घूम रहे थे । यमुना नदी पर बना वजीराबाद बैराज यमुना को दो हिस्सों में बांटता है । जब हम लोग वजीराबाद बैराज के पास यमुना के पूर्वी किनारे पर घूम रहे थे तो हमने देखा कि एक विदेशी मूल का नागरिक उमस-भरी दोपहर की धूप में घास पर बैठकर यमुना में बंसी से मछली पकड़ने में मशगूल है । हमने उससे जानने की कोशिश की कि वह यहां इतनी कड़कड़ाती धूप और उमस में क्यों बैठा है और वह यहां तक कैसे आया ? उसने बताया, “मैं कोरिया का रहने वाला हूं और दिल्ली में कोरियन दूतावास में पदाधिकारी हूं । मैं मछली पकड़ने का बहुत शौकीन हूं । जब मेरा पदस्थापन दिल्ली दूतावास में हुआ, तब मैं ऐसे स्थान की तलाश करने लगा जहां मैं अपने मछली पकड़ने के शौक को पूरा कर सकूं । मैंने नेट के सहारे यमुना नदी के इस स्थान की तलाश की और पिछले दो वर्षों से मैं हर रविवार को यहां आकर मछली पकड़ने में समय बिताता हूं ।“ उसने यह भी बताया कि वह यह काम कानूनी रूप से करता है, उसने दिल्ली सरकार से इसके लिए लाइसेंस भी लिया है ताकि कोई उसे परेशान न करे । हमने कहा कि आप कितनी मछली पकड़ लेते हैं ? उसने बताया, “सवाल मछली की संख्या या वजन का नहीं है, इस काम से मुझे सुकून और शांति मिलती है ।”

उस दिन हम लोगों ने देखा कि वजीराबाद बैराज के ऊपर यमुना के पूर्वी और पश्चिमी दोनों किनारों पर बहुत बड़ी संख्या में लोग अकेले या समूह में मछली पकड़ने के लिए आए हुए हैं । हमने अलग-अलग लोगों से बात की । सबने यही बताया कि हम रोजगार तो कोई और करते हैं, लेकिन जब भी अवकाश मिलता है तब भागकर यहां आ जाते हैं और भाग-दौड़ की जिंदगी से कुछ देर के लिए हम अलग हो जाते हैं । यहां मछुआरों के भी कई समूह हैं जो विगत चार दशक से यमुना नदी में मछली पकड़ते हैं और यह उनका व्यवसाय भी है, इसके लिए दिल्ली सरकार अलग लाइसेंस देती है । इन मछुआरा समाज के लोगों ने यमुना के बगल में एक काॅलोनी भी बसाई है जिसे बंगाली काॅलोनी के नाम से जाना जाता है । यह ध्यातव्य है कि ये लोग मूल रूप से पश्चिम बंगाल के रहने वाले है । इनका कहना है कि मछली के उत्पादन और इससे जुड़ा हुआ काम “जल कृषि“ की श्रेणी में है, जो कृषि का ही हिस्सा है ।

जब हम लोग नदी के पश्चिमी किनारे पर उत्तर की ओर बढ़ते हैं, तब हमें खेतों में लहलाती हुई धान की फसल और महक का एक समतल मैदान दिखता है और ऐसी अनुभूति होती है कि यह दिल्ली नहीं है । हम देखते हैं, परखते और पता करते हैं तब मालूम होता है कि यह इलाका दिल्ली का ही है । पल्ला, हिरनकी, बुराड़ी, मुखमेलपुर, बख्तावरपुर, तिग्गी आदि दिल्ली में ऐसे सैकड़ों गांव हैं जहां बदलते मौसम और बदलती मिट्टी के अनुसार फसलें भी बदल जाती हैं । हमारी मुलाकात पल्ला गांव में विकास शौकीन से होती है । वह चैबीस-पच्चीस वर्ष का जवान है, हर तरह से आधुनिक । विगत दो सालों से वह काॅर्पोरेट की अपनी नौकरी छोड़कर खेतों की मिट्टी से खेल रहा है । उसके घर के सब लोग नाराज हैं । उसने बताया कि उसकी मां कहती है, “हमने तुम्हें इसलिए पढ़ाया था कि तुम वापस खेती करो ! कहां तुम गोरे और स्मार्ट थे ! अब काले होते जा रहे हो ।“ उसने बताया कि वह एक कंपनी में इंजिनियर था, सुबह से आधी रात तक फोन सुनने और उसपर अमल करने में जिंदगी निकल रही थी । वहां सुख-सुविधा के सभी सामान थे, नहीं था तो अवकाश और सुकून । अब जब मैं खेत पर आता हूं तो यहां से जाने का दिल नहीं करता । मेरे परिवार का अन्य व्यवसाय भी है; लेकिन मैंने व्यवसाय नहीं, परिवार की भूमि संभालने की ठानी । उसने बताया कि दिल्ली विकास प्राधिकरण ने दिल्ली मास्टर प्लान के तहत सभी गांवों की खेती की जमीनों को अलग-अलग योजनाओं में डालकर गांवों को शहरी श्रेणी में कर दिया है जिसके तहत दिल्ली में कृषि गतिविधि गैर-कानूनी है । इस वजह से दिल्ली के किसान कृषि से जुड़ी सरकारी सुविधाओं से वंचित हैं । विकास शौकीन ने अपनी खेती को नये स्वरूप में ढाला है और आधुनिक तौर-तरीकों से लैश किया है । इस इलाके के किसान धान और गेहूं की पराली को संजोकर रखते हैं और उसका इस्तेमाल मशरूम की खेती करने में करते हैं ।

ऐसा नहीं है कि दिल्ली में सिर्फ भूमि-स्वामी किसान ही खेती करते हैं । बदलते समय में खेती करने के तरीके और समूह में भी परिवर्तन हो रहे हैं । हमें यह भी जानकारी मिली है कि दिल्ली का बहुत बड़ा भू-भाग, खेती की जमीन किसानों से अधिगृहीत करके, साधन-संपन्न वर्ग को फार्म हाउस बनाने के लिए दिया गया है। उन जमीनों का वे बहुआयामी उपयोग कर रहे हैं जिसमें खेती भी एक है । लेकिन वह खेती आम तरह की नहीं है, वह खास है और खास वर्ग के लिए है । यह इलाका कोई छोटा इलाका नहीं है, यह बहुत बड़े भू-भाग पर फैला है । फार्म से फार्म हाउस के धंधे में बड़े नौकरशाहों, व्यवसायियों, राजनेताओं के साथ-साथ बड़े-बड़े धार्मिक मठ भी शामिल हैं । किसानों की कृषि को गैर-कानूनी घोषित करके उस जमीन को फार्म हाउस में बदला गया है ।

इसके अलावा अब फल, सब्जियां, सलाद की पत्तियां लगाने और उगाने की तरफ ललक और रुचि बढ़ रही है । दिल्ली की अलग-अलग आबादी में लोग अपने घर के आगे-पीछे की खाली जमीनों, बालकोनी, छतों, जहां पर भी संभव है वहां पौधे लगा रहे हैं । यह तो कृषि का एक रूप है । भैंस, बकरी, भेड़, सुअर, मुर्गी, बतख पालने का काम शहर के अलग-अलग इलाकों में हो रहा है । इसे पशुपालन की श्रेणी में रखा जाता है तथा इसका सीधा रिश्ता कृषि से है । दिल्ली के विभिन्न समूह अलग-अलग गतिविधियों में सक्रिय हैं और इसका सीधा रिश्ता उनके परिवार के जीविकोपार्जन से है । लेकिन किसी समूह द्वारा की जा रही गतिविधि अवैध है और किसी की वैध; किसी की गतिविधि आधुनिकता और अमीरी का प्रतीक तो किसी की गतिविधि पिछड़ा और गरीबी का प्रतीक ।

दिल्ली में कानूनी रूप से कृषि नहीं हो सकती और न ही होती है; फिर भी शहर का बड़ा भू-भाग और लाखों-लाख लोग इस अभिक्रम में लगे हुए है। यह परिदृश्य सिर्फ दिल्ली का नहीं है, भारत की आई टी सिटी बेंगलुरु और हैदराबाद अर्बन फार्मिंग का हब बनते जा रहे हैं । इसमें वे लोग भी आ रहे हैं जो अपना हाथ आधुनिक माने जाने वाले क्षेत्रों में आजमा चुके हैं । उसमें वे सफल भी रहे हैं, लेकिन सफलता के साथ सुकून की तलाश उन्हें इस ओर खीच रही है । यह भी नहीं है कि यह हालत सिर्फ हमारे शहरों की है और हम आधुनिकाचार में पिछड़ते हुए इसे अपना रहे हैं, बल्कि यह बयार उन मुल्कों में भी बह रही है जिन्होंने आधुनिकता की वे सीढ़ियां पा ली हैं जिन्हें पाने के लिए हम व्याकुल हैं और जिसकी चाह में हमने अपना तानाबाना तोड़ा है उसे वे अपना रहे हैं ।

आज हम जिन चुनौतियों को झेल रहे हैं, उन्हें हमने खुद पैदा किया है । हमने उद्योगों का ऐसा जाल बिछाया है, जो तात्कालिक सुविधा और दूरगामी बीमारी पैदा कर रहा है । हमने ऐसा ढांचागत निर्माण किया है जिसमें ऊर्जा और पूंजी तो खूब लगती है, लेकिन वह दो-तीन प्रतिशत आबादी को आराम और बाकी को तकलीफ देता है । दिल्ली में 1998 में जब मेट्रो का शिलान्यास हुआ था, उस वक्त कहा गया था कि अब शहर जाम-मुक्त होगा, प्रदूषण का नामोनिशान नहीं रहेगा, कारों पर लगाम लगेगी, कार-स्वामी मेट्रो से आया-जाया करेंगे, रोजगार में इजाफा होगा, आदि-आदि । अब दो दशक के बाद भी हम उसकी समीक्षा नहीं कर रहे हैं, बल्कि अब हर दस लाख की आबादी वाले शहर को सरकार मेट्रोमय कर रही है ।
हमने शहर को कारों और प्रदूषण आदि से बचाने के नाम पर मेट्रो बनाया । आज मेट्रो भी बढ़ रहा है और कारों की संख्या भी । लेकिन प्रदूषण की मार कम होने की बजाय नये-नये रूप में और गहराने लगी है । हमारी सरकार और न्यायालय इस बीमारी का इलाज आॅड-इविन में ढ़ूढ़ते हुए अब आॅक्सीजन टाॅवर लगाने की दिशा में बढ़ते हुए दिख रहे हैं । इससे शहर की बीमारियों का इलाज नहीं हो रहा है, बल्कि नए-नए रोग पैदा हो रहे हैं । दिल्ली में सार्वजनिक परिवहन की सुविधा देने वाले दिल्ली परिवहन निगम के बेड़े में 11 हजार बसों की जरूरत है -यह आकलन दो दशक पहले हुआ था । इस लक्ष्य को किसी भी सरकार ने पूरा नहीं किया । आज दिल्ली में बसों की संख्या 5 हजार से भी कम है। परिवहन के मद का पूरा बजट मेट्रो में खप जाता है तथा बस-आधारित सार्वजनिक परिवहन की हालत बद से बदतर हो रही है। इसका शिकार यहां का कामकाजी वर्ग हो रहा है । दिल्ली में बस की यात्रा सस्ती है। यह गंतव्य-स्थल के करीब तक सुविधा देने वाली सवारी है । मेट्रो की सवारी महंगी है और यह खास दूरी तक ही सुविधा देती है । हमारे शहरों की वास्तुकला महिला-विरोधी, वरिष्ठ नागरिक-विरोधी, बच्चों का बचपन छीनने वाली और गरीबों की दुश्मन है, क्योंकि हमारे शहर का पूरा तंत्र कार-स्वामियों और संपन्न लोगों के लिए है । यहां पैदल चलने वालों के लिए न जगह है, न इज्जत । साइकिल, साइकिल रिक्शा और लोक परिवहन का उपयोग करने वाले लोग शहर के नागरिक नहीं, ‘घुसपैठिये‘ हैं । इनके ही टैक्स के पैसे से बनाए जाने वाला शहर इन्हें ही वंचित कर रहा है । ये लोग ही प्रदूषण के शिकार हैं । ये छतविहीन लोग आवासहीन हैं और रोजगार-विहीन जीवन जीने को अभिशप्त हैं ।

आज शहर की अवधारणा में परिवर्तन हो रहा है । अब आधुनिक शहर वह नहीं है जो मेट्रो रेल और फ्लाइओवर बना रहा है । वह भी शहर आधुनिक नहीं है जो शहरी गतिविधियों को अलग-अलग सेक्टर में बांटकर देख रहा है । आज तो आधुनिक और समावेशी शहर वह है जो अपना खाना खुद पैदा करता है और अपने कचरे के निष्पादन की जिम्मेवारी भी स्वयं लेता है; जो अपने बच्चों के लिए खेल के मैदान बनता है और अपने नागरिकों के लिए खुली सांस के लिए हरियाली उपजाता है; जो तकनीक और विज्ञान का इस्तेमाल हर तरह की गैर-बराबरी से मुक्ति दिलाने के लिए करता है । शहरी खेती, पशुपालन और उससे जुड़ी हुई हजारों गतिविधियां ऐसा शहर बनाने का नया मार्ग दिखाती हैं ।

लेकिन हम उसी पुराने ढर्रे पर चल रहे हैं । हमारा राजनैतिक तंत्र चिंतनहीन और विचारहीन हो गया है । यह अपनी सामुदायिक समझ को आधुनिक परिवेश में नवसृजित नहीं कर पा रहा है । ऐसी ही हालत हमारे बौद्धिक समूहों और परिवर्तनकारी जमातों की है । इसलिए हम पुराने और रूढ़िवादी विकास को आधुनिक मानकर ढोने को अभिशप्त हैं । हम जिन विचारधाराओं से प्रेरणा लेते हैं, यदि उनकी मौलिकता को आधुनिक कालखंड के अनुकूल ढाल पाने में असमर्थ रहे तो हमें विलुप्तीकरण के रास्ते पर जाने से कोई नहीं बचा पाएगा । आज गांधीवाद के प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व और साम्यवाद के मानवीय गैर-बराबरी के सिद्धांतों को बदले हुए परिवेश के अनुसार चिंतनधारा विकसित करनी होगी । नई धार के साथ नेतृत्व विकसित करना एक चुनौती-भरा उपक्रम है जिसमें आज की चुनौतियों से लड़ने की ऊर्जा मिलेगी ।

– राजेंद्र रवि

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